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भारतीय सेना की टूटू रेजीमेंट:चीन से लड़ने के लिए तैयार की गई थी एक खुफिया रेजीमेंट, ये सेना के बजाय रॉ के जरिए सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करती है

  • टूटू रेजिमेंट को शुरुआती दौर में ट्रेनिंग सीआईए ने दी थी, इस रेजीमेंट के जवानों को अमेरिकी आर्मी की ‘ग्रीन बेरेट’ की तर्ज़ पर ट्रेनिंग दी गई
  • पूर्व सेना प्रमुख रहे दलबीर सिंह सुहाग भी टूटू रेजीमेंट की कमान संभाल चुके हैं, पहले इसमें तिब्बती भर्ती होते थे, अब गोरखा जवान भी शामिल

29 अगस्त की रात को चीन की सेना ने लद्दाख में फिर (गलवान के करीब 75 दिन बाद) घुसपैठ की कोशिश की। हालांकि, इस घुसपैठ को भारत के मुस्तैद जवानों ने नाकाम कर दिया। बुधवार को खबर आई कि इस घुसपैठ के दौरान भारत का एक जवान शहीद हो गया। तिब्बती मूल का यह जवान स्पेशल फोर्सेस यानी एक टूटू रेजीमेंट का था। क्या है ये टूटू रेजीमेंट और किस तरह काम करती है, पढ़ें स्पेशल रिपोर्ट…

अक्टूबर 2018 की बात है। यूरोपीय देश एस्टोनिया की मशहूर गायिका यना कास्क भारत आई थीं। वो अपना एक म्यूजिक वीडियो यहां शूट करना चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने उत्तराखंड के चकराता क्षेत्र को चुना था।

देहरादून से करीब 100 किलोमीटर दूर बसा चकराता एक बेहद खूबसूरत पहाड़ी कस्बा है। यहीं पर यना अपने दोस्तों के साथ शूटिंग कर ही रही थीं, लेकिन जैसे ही लोकल इंटेलिजेंस यूनिट को इसकी भनक लगी यना और उनके साथियों को तुरंत हिरासत में ले लिया गया। उन्हें देश छोड़कर जाने का नोटिस थमा दिया गया और स्थानीय पुलिस ने केंद्र सरकार से कहा कि यना को ब्लैक-लिस्ट कर दिया जाए, ताकि वे भविष्य में भारत न आ सकें।

यह सब इसलिए हुआ क्योंकि चकराता एक प्रतिबंधित क्षेत्र है। यहां केंद्रीय गृह मंत्रालय की अनुमति के बिना किसी भी विदेशी नागरिक को जाने की इजाजत नहीं है। यना इस बात से अनजान थीं और वो बिना किसी परमिशन के ही यहां दाखिल हो चुकी थीं, इसलिए उन्हें इस कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

यना की ही तरह ज्यादतर भारतीय भी इस बात से अनजान ही हैं कि चकराता में विदेशियों का आने पर रोक है। यह प्रतिबंध क्यों है, इसकी जानकारी तो और भी कम लोगों को है। चकराता एक छावनी क्षेत्र है जो कि सामरिक दृष्टि से भी काफी संवेदनशील है। यहां विदेशियों के आने पर रोक की सबसे बड़ी वजह है भारतीय सेना की बेहद गोपनीय टूटू रेजीमेंट।

टूटू रेजीमेंट भारतीय सैन्य ताकत का वह हिस्सा है जिसके बारे में बहुत कम जानकारियां ही सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हैं। यह रेजीमेंट आज भी बेहद गोपनीय तरीके से काम करती है और इसके होने का कोई प्रूफ भी पब्लिक नहीं किया गया है।

पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू ने टूटू रेजीमेंट बनाने का फैसला लिया था

टूटू रेजीमेंट की स्थापना साल 1962 में हुई थी। ये वही समय था जब भारत और चीन के बीच युद्ध हो रहा था। तत्कालीन आईबी चीफ भोला नाथ मलिक के सुझाव पर तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने टूटू रेजीमेंट बनाने का फैसला लिया था।

इस रेजीमेंट को बनाने का मकसद ऐसे लड़ाकों को तैयार करना था जो चीन की सीमा में घुसकर, लद्दाख की कठिन भौगोलिक स्थितियों में भी लड़ सकें। इस काम के लिए तिब्बत से शरणार्थी बनकर आए युवाओं से बेहतर कौन हो सकता था। ये तिब्बती नौजवान उस क्षेत्र से परिचित थे, वहां के इलाकों से वाकिफ थे।

जिस चढ़ाई पर लोगों का पैदल चलते हुए दम फूलने लगता है, ये लोग वही दौड़ते-खेलते हुए बड़े हुए थे। इसलिए तिब्बती नौजवानों को भर्ती कर एक फौज तैयार की गई। भारतीय सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल सुजान सिंह को इस रेजीमेंट का पहला आईजी नियुक्त किया गया।

सुजान सिंह दूसरे विश्व युद्ध में 22वीं माउंटेन रेजीमेंट की कमान संभाल चुके थे। इसलिए नई बनी रेजीमेंट को ‘इस्टैब्लिशमेंट 22’ या टूटू रेजीमेंट भी कहा जाने लगा।

शुरुआत में अमेरिका की खुफिया एजेंसी ने दी थी ट्रेनिंग

दिलचस्प है कि टूटू रेजीमेंट को शुरुआती दौर में ट्रेंड करने का काम अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने किया था। इस रेजिमेंट के जवानों को अमेरिकी आर्मी की विशेष टुकड़ी ‘ग्रीन बेरेट’ की तर्ज़ पर ट्रेनिंग दी गई। इतना ही नहीं, टूटू रेजिमेंट को एम-1, एम-2 और एम-3 जैसे हथियार भी अमेरिका की तरफ से ही दिए गए।

इस रेजीमेंट के जवानों की अभी भर्ती भी पूरी नहीं हुई थी कि नवंबर 1962 में चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर दी, लेकिन इसके बाद भी टूटू रेजीमेंट को भंग नहीं किया गया। बल्कि इसकी ट्रेनिंग इस सोच के साथ बरकरार रखी गई कि भविष्य में अगर कभी चीन से युद्ध होता है तो यह रेजीमेंट हमारा सबसे कारगर हथियार साबित होगी।

टूटू रेजीमेंट के जवानों को विशेष तौर से गुरिल्ला युद्ध में ट्रेंड किया जाता है। इन्हें रॉक क्लाइंबिंग और पैरा जंपिंग की स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है और बेहद कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने के गुर सिखाए जाते हैं।

1971 में स्पेशल ऑपरेशन ईगल में किया गया था शामिल

अपने अदम्य साहस का प्रमाण टूटू रेजीमेंट ने 1971 के बांग्लादेश युद्ध में भी दिया है, जहां इसके जवानों को स्पेशल ऑपरेशन ईगल में शामिल किया गया था। इस ऑपरेशन को अंजाम देने में टूटू रेजीमेंट के 46 जवानों को शहादत भी देनी पड़ी थी। इसके अलावा 1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार, ऑपरेशन मेघदूत और 1999 में हुए करगिल युद्ध के दौरान ऑपरेशन विजय में भी टूटू रेजीमेंट ने अहम भूमिका निभाई।

शहादत के बदले नहीं मिलता सार्वजनिक सम्मान

इस रेजीमेंट के जवानों का सबसे बड़ा दर्द ये रहा है कि इन्हें अपनी क़ुर्बानियों के बदले कभी वो सार्वजनिक सम्मान नहीं मिल पाया जो देश के लिए शहीद होने वाले दूसरे जवानों को मिलता है। इसके पीछे वजह है कि टूटू रेजीमेंट बेहद गोपनीय तरीके से काम करती रही है। इसकी गतिविधियों को कभी पब्लिक नहीं किया जाता।

यही वजह है कि 1971 में शहीद हुए टूटू के जवानों को न तो कोई मेडल मिला और न ही कोई पहचान मिली। जिस तरह से रॉ के लिए काम करने वाले देश के कई जासूसों की कुर्बानियां अक्सर गुमनाम जाती हैं, वैसे ही टूटू के जवानों के शहादत को पहचान नहीं मिल सका।

बीते कुछ सालों में इतना फर्क जरूर आया है कि टूटू रेजीमेंट के जवानों को अब भारतीय सेना के जवानों जितना ही वेतन मिलने लगा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कुछ साल पहले कहा था, ‘ये जवान न तो भारतीय सेना का हिस्सा हैं और न ही भारतीय नागरिक। लेकिन, इसके बावजूद भी ये भारत की सीमाओं की रक्षा के लिए हमारे जवानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे हैं।’

पूर्व सेना प्रमुख दलबीर सिंह संभाल चुके हैं कमान

टूटू रेजीमेंट के काम करने के तरीकों की बात करें तो आधिकारिक तौर पर यह भारतीय सेना का हिस्सा नहीं है। हालांकि, इसकी कमान डेप्युटेशन पर आए किसी सैन्य अधिकारी के ही हाथों में होती हैं। पूर्व भारतीय सेना प्रमुख रहे दलबीर सिंह सुहाग भी टूटू रेजीमेंट की कमान सम्भाल चुके हैं। यह रेजिमेंट सेना के बजाय रॉ और कैबिनेट सचिव के जरिए सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करती है।

भाजपा से मिलीभगत के राहुल के बयान पर कांग्रेस का साढ़े चार घंटे में डैमेज कंट्रोल, कहा- राहुल ऐसा कुछ नहीं बोले

कांग्रेस में जमकर कलह हो रही है… और इस बार खबर सूत्रों के हवाले से नहीं आई है, बल्कि खुद उसके आला नेता अपने बयानों से ही यह बात साबित कर दे रहे हैं। पार्टी की सबसे बड़ी संस्था कांग्रेस वर्किंग कमेटी यानी सीडब्ल्यूसी की सोमवार को जब बैठक शुरू हुई, तो सोनिया गांधी ने अंतरिम अध्यक्ष का पद छोड़ने की पेशकश की।

वहीं, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोनिया को भेजी गई नेताओं की चिट्ठी की टाइमिंग पर सवाल उठाए। राहुल का आरोप था कि पार्टी नेताओं ने यह सब भाजपा की मिलीभगत से किया। राहुल के इस बयान को बमुश्किल 20-25 मिनट नहीं बीते होंगे कि उनका विरोध शुरू हो गया। विरोध करने वालों में सबसे आगे थे गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल। बाद में कांग्रेस ने कहा कि राहुल ने ‘भाजपा के साथ मिलीभगत’ जैसा या इससे मिलता-जुलता एक शब्‍द भी नहीं बोला था।

दरअसल, करीब 15 दिन पहले पार्टी के 23 नेताओं ने सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर कहा था कि भाजपा लगातार आगे बढ़ रही है। पिछले चुनावों में युवाओं ने डटकर नरेंद्र मोदी को वोट दिए। कांग्रेस में लीडरशिप फुल टाइम होनी चाहिए और उसका असर भी दिखना चाहिए।

सीडब्ल्यूसी की मीटिंग में आज क्या हुआ?

  • सोनिया गांधी ने अंतरिम अध्यक्ष पद छोड़ने की पेशकश करते हुए कहा कि मुझे रिप्लेस करने की प्रक्रिया शुरू करें। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने उनसे पद पर बने रहने को कहा।
  • बीते दिनों पार्टी नेतृत्व में बदलाव को लेकर कांग्रेस नेताओं की चिट्ठी पर राहुल गांधी ने नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि जब सोनिया गांधी हॉस्पिटल में भर्ती थीं, उस वक्त पार्टी लीडरशिप को लेकर लेटर क्यों भेजा गया। पार्टी लीडरशिप में बदलाव की मांग का लेटर भाजपा की मिलीभगत से लिखा गया। (इस चिट्ठी से जुड़ी पूरी खबर यहां पढ़ें)
  • ‘भाजपा से मिलीभगत’ के राहुल के आरोपों पर विवाद हो गया। बमुश्किल 20-25 मिनट के अंदर पूर्व मंत्री कपिल सिब्बल ने ट्वीट किया, ‘हमने राजस्थान हाईकोर्ट में कांग्रेस पार्टी का केस कामयाबी के साथ लड़ा। बीते 30 साल में कभी भी, किसी भी मुद्दे पर भाजपा के पक्ष में बयान नहीं दिया। फिर भी हम भाजपा के साथ मिलीभगत में हैं?’ कुछ देर बात सिब्बल ने ट्विटर से अपना परिचय बदल दिया और कांग्रेस शब्द को हटा दिया।
  • थोड़ी ही देर में राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि अगर भाजपा से मिलीभगत होने के राहुल गांधी के आरोप साबित हुए तो मैं इस्तीफा दे दूंगा।
  • कांग्रेस की पूर्व नेता दिव्या स्पंदना ने कहा कि मुझे लगता कि राहुलजी ने गलती की। उन्हें कहना चाहिए था कि कांग्रेस के नेताओं ने यह चिट्ठी भाजपा और मीडिया के मिलीभगत से भेजी। उन्होंने कहा कि ना केवल मीडिया में चिट्ठी को लीक किया, बल्कि अभी चल रही सीडब्ल्यूसी की बैठक की बातचीत को मीडिया में मिनट टू मिनट लीक भी किया जा रहा है। गजब है।
  • कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने दोपहर 1:30 बजे से कहा कि राहुल ने ‘भाजपा के साथ मिलीभगत’ जैसा या इससे मिलता-जुलता एक शब्‍द भी नहीं बोला था।
  • भाजपा से मिलीभगत के आरोप पर गुलाम नबी आजाद ने दोपहर 3:50 बजे सफाई दी। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने ऐसा कभी नहीं कहा। ना ही सीडब्ल्यूसी में और ना ही इसके बाहर।

 

पिछले साल अगस्त में अंतरिम अध्यक्ष बनी थीं सोनिया
राहुल गांधी पहले ही पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर चुके हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया था। तब सोनिया ने अगस्त में एक साल के लिए अंतरिम अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली।

कांग्रेस की कलह पर भाजपा का तंज
मध्यप्रदेश के मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए कई योग्य उम्मीदवार हैं। इनमें राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, रेहान वाड्रा और मिराया वाड्रा शामिल हैं। कार्यकर्ताओं को समझना चाहिए कि कांग्रेस उस स्कूल की तरह है, जहां सिर्फ हेडमास्टर के बच्चे ही क्लास में टॉप आते हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कांग्रेस में सही बात करने वाला गद्दार है। तलवे चाटने वाले कांग्रेस में वफादार हैं। जब पार्टी की ये स्थिति हो जाए तो उसे कोई नहीं बचा सकता। उधर, उमा भारती ने कहा, ‘गांधी-नेहरू परिवार का अस्तित्व संकट में हैं। इनका राजनीतिक वर्चस्व खत्म हो गया है। इसलिए अब पद पर कौन रहता है या कौन नहीं यह मायने नहीं रखता है। कांग्रेस को बिना कोई विदेशी एलीमेंट के स्वदेशी गांधी की तरफ लौटना चाहिए।’

आखिर बदलाव की मांग क्यों उठ रही?
1. पार्टी का जनाधार कम हो रहा: 2014 के चुनाव में सोनिया गांधी अध्यक्ष थीं। इस चुनाव में कांग्रेस को अपने इतिहास की सबसे कम 44 सीटें ही मिल सकीं। 2019 के चुनाव के दौरान राहुल गांधी अध्यक्ष थे। पार्टी सिर्फ 52 सीटें ही जीत सकी।
2. कैडर कमजोर हुआ: देश में कांग्रेस का कैडर कमजोर हुआ है। 2010 तक पार्टी के सदस्यों की संख्या जहां चार करोड़ थी, वहीं, अब यह लगभग एक करोड़ से कम रह गई। मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और मणिपुर समेत अन्य राज्यों में कांग्रेस में नेताओं की खींचतान का असर पार्टी के कार्यकर्ताओं पर पड़ा है।
3. कांग्रेस की 6 राज्यों में सरकार: कांग्रेस की सरकार छत्तीसगढ़, पुडुचेरी, पंजाब, राजस्थान, झारखंड और महाराष्ट्र में बची। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के बगावत के बाद कमलनाथ की सरकार गिर गई।

 

काशी मथुरा बाकी है:कहानी काशी की दीवानी अदालत के एक मुकदमे की, जो काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद का भविष्य तय करेगा

  • हिंदू पक्ष की मांग है कि विवादित क्षेत्र स्वयंभू विश्वेश्वर का ही अंश है, इसलिए वह इलाका हिंदुओं को सौंप दिया जाए
  • मुस्लिम पक्ष ने लिखित में कोर्ट से कहा है कि विवादित मस्जिद ‘अहल ए सुन्नत’ से वहां कायम है, दावा कि जब से कुरान है, तब से मस्जिद है, जो ऐतिहासिक प्रमाणों के विपरीत है
  • चुनौती है उपासना स्थल अधिनियम जिसके मुताबिक जहां मंदिर है वो मंदिर रहेगा, जहां मस्जिद वो मस्जिद, बस अयोध्या को इससे बाहर रखा गया, लेकिन काशी-मथुरा नहीं

 

90 के दशक की शुरुआत पूरे देश में एक सांप्रदायिक धमक के साथ हुई थी। राम मंदिर आंदोलन तब अपने चरम पर था और शुरुआती सालों में ही यह इतना विकराल हुआ कि बाबरी मस्जिद गिरा दी गई। ‘अयोध्या तो झांकी है, काशी मथुरा बाकी है’ जैसे नारे उछाले जाने लगे और इसके प्रभाव से महादेव की नगरी काशी में भी अछूती नहीं रही।

उस दौर में एक तरफ यह आंदोलन सड़कों पर हिंसक रूप ले रहा था तो दूसरी तरफ अदालतों में भी मंदिर-मस्जिद की कानूनी लड़ाई तेज हो रही थी। इसी बीच काशी की दीवानी अदालत में भी एक मुक़दमा दाखिल हुआ जो आज भी लंबित है। यही वो मुक़दमा है जो काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद का भविष्य तय करेगा और जिसके फैसले का इंतजार देश के करोड़ों लोगों को है।

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़ा विवाद सदियों पुराना है। इसी विवाद के चलते साल 1991 में काशी की अदालत में यह मुक़दमा दाखिल किया गया था। इस मुकदमे की वर्तमान स्थिति क्या है और वे कौन से मुद्दे हैं जिन पर सबसे ज्यादा विवाद, ये समझने के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास पर एक नजर डालना बेहद जरूरी है।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास अयोध्या की तरह विवादित नहीं है। यहां कई बातें क्लियर हैं जिन्हें सभी पक्ष सहज स्वीकार करते हैं। मसलन, यह तथ्य विवादित नहीं है कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण औरंगजेब ने करवाया था और यह निर्माण मंदिर तोड़कर किया गया था। औरंगजेब से पहले भी काशी विश्वनाथ मंदिर कई बार टूटा और कई बार बनाया गया। लेकिन साल 1669 में औरंगजेब ने इसे तोड़कर वहां ज्ञानवापी मस्जिद बनवा दी। मंदिर को फिर से बनाने के कई असफल प्रयासों के बाद आखिरकार साल 1780 में अहिल्या बाई होलकर ने मस्जिद के पास एक मंदिर का निर्माण करवाया और यही आज काशी विश्वनाथ मंदिर कहलाता है।

ये इतिहास का वह पहलू है जो निर्विवाद है। इससे अलग जो विवादित पहलू हैं उन्हें समझने की कोशिश न्यायालय में चल रहे मुकदमे से करते हैं। यह मुक़दमा है ‘वाद संख्या 610 सन 1991।’ यह एक रिप्रेसेन्टेटिव सूट यानी प्रतिनिधित्व वाद है और इसका नाम है ‘प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर व अन्य बनाम अंजुमन इंतजामिया मसाजिद व अन्य।’

साल 1991 में यह मुक़दमा काशी के तीन लोगों ने दाखिल किया था। इनमें पहले थे पंडित सोमनाथ व्यास, दूसरे थे पंडित रामरंग शर्मा और तीसरे थे हरिहर पांडेय। इन तीनों के अलावा इस मुक़दमे के चौथे वादी थे ‘स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर।’ इस पक्ष की पैरवी बीते कई सालों से अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी कर रहे हैं। वे कहते हैं, ‘हमारा पक्ष बेहद मज़बूत है और हमें एक सौ एक प्रतिशत विश्वास है कि फैसला हमारे पक्ष में होगा।’ दूसरी तरफ़ अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के संयुक्त सचिव और प्रवक्ता एसएम यासीन भी ठीक ऐसा ही दावा करते हुए कहते हैं, ‘इस मामले में हमारा पक्ष पूरी तरह से संविधान सम्मत है और हम आश्वस्त हैं कि क़ानूनन हमारा पक्ष ज़्यादा मज़बूत है।’